✤ प्रस्तावना:
मिथिला—सभ्यता, विद्या आ सांस्कृतिक चेतना केर आदिकेंद्र जतए ज्ञान केवल आर्जनक साधन नहि, बल्कि समाज सुधारक मंत्र सेहो रहल अछि।
एहि पावन धरती पर जातीय आ भाषिक संगठन सामाजिक भूमिका निभबैत रहल अछि—कखनो वंचित वर्गक स्वर बनि, तऽ कखनो सांस्कृतिक धरोहरक रक्षक रूप मे। मुदा वर्तमान समय मे संस्था सभ जे रूप धारण कऽ लेने अछि, ओ केवल चिंता के विषय नहि, बल्कि मिथिलाक सामाजिक संरचना लेल एकटा गंभीर चुनौती बनि गेल अछि।
एहि आलोचनात्मक लेख मे, हम एहि संस्था सभक भीतर सॅं उठैत विघटनकारी प्रवृत्ति केॅ विवेचनात्मक दृष्टिकोण सॅं प्रस्तुत कऽ रहल छी – जतए सेवा एक मुखौटा बनि गेल अछि स्वार्थ, सत्ता, आ नेपथ्य साजिश समाज पर हावी भऽ रहल अछि।
✤ 1. नेपथ्य साजिश आ मुखौटा नेतृत्व: सामाजिक सत्ता के नव रंगमंच – मूलतः समाज के प्रबुद्ध, शिक्षित आ सुसंस्कृत लोकसभ —जिनकर कर्तव्य छल समाज में नेतृत्वक आदर्श प्रस्तुत करब—वर्तमान समय में नेपथ्य में बैसि, स्टियरिंग हाथ में लऽ कऽ संस्था के एहन लोक के हाथ में सौंपि दैत छथि जे चंदा संकलन कार्य मे प्रवीण, अल्पज्ञ, पदलोलुप, लोभी आ संघर्ष-संवाद नहि, केवल आदेश मात्र बुझैत छथि।
नेतृत्व आब उत्तरदायित्व नहि, बल्कि नियंत्रण बनि गेल अछि—”हम सोचब, अहाँ बाजब, कहीं करब” वाला शैली में। एहेन स्थिति में संस्था एकटा कठपुतली रंगमंच बनि जाइत अछि—जतए धागा किछु सुझबुझबाला व्यक्ति सभक हाथ में होइत अछि, आ रंगमंच पर दौड़ रहल पात्र सब मात्र मुखौटा।
ई मुखौटा सभ केॅ पृष्ठभूमि के नेतृत्वकर्ता समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति घोषित कऽ देने रहैत छथिन्ह, इएह एकरा सभक आत्म सन्तुष्टि के साधन छीयै। कुनु कुनु समय मे किछु आर्थिक लाभ सेहो भऽ जाइत छैक।
जखन एहेन पात्र सभके निर्णय क्षमता मे किछु विकास होमए लागैत छै तखन एकरा हटा एहने पात्र सभक दोसर समूह केॅ तिलक लगा देल जाइत छैक। सत्ता संचालक केॅ ने अपयश के भय, ने असफलता के पीड़ा। ओ स्थायी छथि।
✤ 2. पद के पूजा कर्तव्य के कब्र :-
पूर्व में संस्था के पदभारक केॅ लोक समाजिक बोझ बुझैत छल। कुनु संस्था के पदाधिकारि होएब माने छल— जिम्मेवारी उठेनाई , विवाद के समाधान, अधिकारक हेतु संघर्ष, गरीबक मदद, समसामयिक चुनौती के सामना ।
मुदा एखन, संस्था सभ ‘पद के सौदा’ बनि गेल अछि। कोन विधिसँ चुनाव भेल ? कोना सदस्य बनल ? के आ कीयै सदस्य बनल ? —एहेन प्रश्न पूछब अपराध बनि गेल अछि। अधिकांश संस्था एकटा सुसज्जित “निजी दुकान” बनि चुकल अछि, जतए अपन गुट, अपन एजेंडा, अपन ठेकेदारी मात्र विद्यमान अछि।
“पद लेल खून बहा देबए” वाला मानसिकता आब “सेवा लेल जीयब” के आदर्श के समाप्त कऽ देने अछि। जोर- जबरदस्ती, आर्थिक प्रलोभन, पारिवारिक एवं सामाजिक दबाव आ विभिन्न संस्था के मूल संचालक सभके बीच भेल अदृश्य सम्झौता के माध्यम सॅं पद केॅ हथिआएल जाइत अछि।
✤ 3. चंदा संस्कृति: स्वेच्छा कि विवशता ?
मिथिलांचल में संस्था सभ द्वारा चंदा उठेनाय सामान्य परंपरा अछि। लोक श्रद्धा सँ दैत अछि— कुनु भवन लेल, यज्ञ लेल, कोनो आयोजन लेल। एहि चरम भौतिकवादी युग मे असीमित आवश्यकता आ सीमित संसाधन के जाॅंत तर पीसाइत मध्यम वर्गीय आ निम्न मध्यम वर्गीय लोक सभ अपन धार्मिक आ सामाजिक संवेदना के रक्षार्थ पारिवारिक आवश्यकता के कटौती कऽ दान दैत छथि। कतहुँ स्वेच्छा त’ कतहुँ धार्मिक आ सामाजिक विवशता। मुदा दुःखद गप्प ई जे एहेन दानक पारदर्शिता एक दम शून्य अछि।
ककरा कतेक चंदा भेटल? कतऽ खर्च भेल? परिणाम की भेल?—एहि सब पर पर्दा अछि। किछु कार्य , अधिक कागजी लेखा । संस्था ओहि लोकसभ के लेल कमाई के एक माध्यम बनि गेल अछि—आ समाजक भावना के व्यापारिक पूंजी।
✤ 4. धार्मिकता सॅं धंधा धरि: आस्था के अवमूल्यन –
धर्म मिथिलांचल के आत्मा रहल अछि। मुदा एखनुक संस्था सभ एहि आत्मा के साधन नहि अपितु संस्था केॅ साधन बना लेने अछि। पंडाल, भंडारा, कथा, कीर्तन, पूजन —सबसँ बड़का प्रचारक अवसर बनि गेल अछि। लोक पूजा करैत अछि, आयोजक फोटो खिंचबैत अछि। एहि तमाशा सभ सॅं समाज केवल रीतिनिष्ठ बनैत जा रहल अछि, नव मूल्य नै बनि रहल अछि।
✤ 5. प्रचार मे प्रेरणा नहि, प्रदर्शन के प्रधानता :-
एखन फेसबुक बनब संस्था सभ मे आम बात भऽ गेल अछि । कार्य भले हो न हो, मुदा स्टेज पर दस बैनर, पचास फोटो, सौ स्टेटस अपडेट होयबाक चाही। एकटा निशुल्क कोचिंग सेन्टर , गरीबक स्वास्थ्योपचार, सामूहिक विवाह/ उपनयन वा बेरोजगार लेल प्रशिक्षण कार्यक्रम सॅं बेसी चर्चा मंच के कुर्सी के होइत अछि।
समाज के अधिकांश अकर्मण्य केॅ मंच पर आसन आ गर्दनि मे गेन्दा फूलक माला चही, एहि वास्ते कुनु विशेष योग्यता नहि सिद्ध करए पडैत छैक । आदर योग्य आ निष्ठावान लोक सभ प्रायः एहि होड़ बाजी सॅं दूर रहैत छथि। लोक प्रियता के नाम पर उद्देश्य के वास्तविकता के कुचलल जा रहल अछि ।
प्रचार- प्रसार , जन समर्थन आ अर्थ संकलन के उद्देश्य सॅं सम्मान कार्यक्रम के आयोजन कएल जाइत अछि। जे अधिक चंदा देताह, जिनका समर्थन सॅं संस्थाक कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह नहि लागत, एहेन व्यक्ति सभ केॅ सम्मानित कएल जाइत अछि। एहि सभ सॅं समाज मे वितृष्णा देखल जाइत अछि।
✤ 6. संस्था = ठेका+अनुदान+ चंदा+अप्पन लोक
बहुसंख्यक संस्था मिथिलांचल में आब सरकारी अनुदान, सामाजिक चंदा, जमीन, भवन निर्माण के ठेका, या अन्य लाभ लेल बनि रहल अछि। काज के उद्देश्य सॅं बेसी, लाभ के संभावना देखल जा रहल अछि। निजी उपयोग लेल संस्थाक भवन, आयोजन स्थल, या कार्यक्रम —सब अपनहि या अपना सनके लोक मे सीमित ।
एहि सब सॅं पैघ प्रश्न खड़ा होइत अछि— की संस्था आब केवल नामक रहि गेल अछि ? की कन्ट्रैक्टर्स कम्पनी के परिष्कृत रूप बनि केॅ रहि गेल अछि ? अथवा अपन व्यापार प्रवर्द्धन हेतु जन सम्पर्क के माध्यम ? की सरकारी अनुदान के दुरूपयोगक क्रीड़ा स्थल ? की पारिवारिक भरणपोषण के माध्यम ? अथवा सामाजिक पहचान बनेबाक साधन ?
✤ 7. सामाजिक पूंजी के अपव्यय :-
संस्था सभ के बीच एक के बाद एक धार्मिक मनोरंजनात्मक कार्यक्रम आ भोज- भतेड़ के आयोजनक प्रतियोगिता सामाजिक पूंजी के अपव्यय कऽ रहल अछि । यद्यपि एहेन आयोजन सभ मिथिलांचल के प्राचीन परम्परा थीक जकरा बहुत सादगी सॅं सौहार्दता हेतु उपयोग कएल जाइत रहै ।
एखन संस्था सभ एहि कार्य मे सक्रिय भेल अछि, पूर्ण तड़क-भडक आ प्रचारात्मक शैली मे । एहेन कार्यक्रम सभ मे मिथिला के सांस्कृतिक मौलिकता केॅ आधुनिक उच्छृंखलता द्वारा बिदीर्ण होइत प्रत्यक्ष देखल जा सकैछ।
✤ 8. नैतिकता पर चोट आ जन-विश्वासक पतन :-
सभ सँ पैघ नुकसान भेल अछि समाजक भरोसा के । लोक एखन कहैत अछि— ओ संस्था तऽ फलाँ के थीक ! संस्थाक नाम सुनिते हँसी उड़ैत अछि, संदेह उठैत अछि, प्रश्नचिह्न लगैत अछि। एहि संस्था सभ प्रति जनमानस मे आदर के दृष्टिकोण नहि अपितु तिरस्कार के भावना जागृत भऽ रहल अछि । जखन संस्था समाज में अविश्वासक प्रतीक बनि जाय, तखन सामाजिक पूंजी के क्षय होइत अछि— जे कोनो समाजक मौलिक ऊर्जा के नष्ट कऽ दैत अछि।
✤ 9. तट पर दीप:-
सेवा सं समर्पण धरि के एहि यात्रा मे यद्यपि एकटा व्यापक हताशा व्याप्त अछि, मुदा गाम-गाम में किछु एहन संस्था, लोक आ समूह अछि जे चुपचाप, बिना प्रचार, समाज के नव ऊर्जा दऽ रहल अछि।
केओ मैथिलीक संवैधानिक अधिकार आ मिथिला के पूर्वाधार विकास के लेल संघर्ष कऽ रहल छथि। कोनो कोना के गाम मे मिथिला के मौलिक संस्कृति एखनहुं सजीव अछि। कोनो शिक्षक अपन गाम में कोचिंग चला रहल छथि। किछु नवयुवक बेरोजगार लेल वर्कशॉप आयोजित करैत छथि।
कोनो महिला समूह गरीब बच्चा के पोशाक दैत अछि । केओ गरीब आ असहाय लोक केॅ रोजगार के प्रबन्ध, सामाजिक आ सांस्कृतिक अवसर पर आर्थिक आ शारीरिक सहयोग करैत छथि । कुनु समूह असहाय, गरीब आ मेधाबी छात्र केॅ अध्ययन मे सहयोग करैत छथिन्ह । कुनु संस्था नि:शुल्क सामूहिक विवाह, उपननय के आयोजन करैत अछि आदि । ई सब आवाज एखनहु मिथिला मे बचल अछि — जे सन्नाटा मे सेवा के स्वर बनि रहल अछि।
✤ 10. उपसंहार:- संस्था जीबए, तऽ समाज जीबए ।
मिथिलाक जातीय आ भाषिक संस्था यदि फेर सँ आत्म-निरीक्षण करय, तऽ ओ पुनः जनसेवा के तीर्थस्थल बनि सकैत अछि।जरूरत अछि:
✤ नेतृत्व में योग्यता आ समय-सीमा लागू हो ।
✤ कुनु व्यक्ति एक कार्यकाल सॅं बेसी पदाधिकारी नहि रहए ।
✤ अपन कार्यकाल उपरांत संस्था के निर्णय प्रक्रिया मे अनावश्यक हस्तक्षेप नहि करए ।
✤ समावेशी सदस्यता सुनिश्चित हो ।
✤ प्रत्येक सदस्य समान रूप सॅं संस्था के स्वामित्व महशूस करए ।
✤ चंदा पारदर्शिता अनिवार्य हो।
✤ कार्यक प्राथमिकता शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य , पूर्वाधार विकास आ संवैधानिक अधिकार के संरक्षण हो।
✤ बाहरी निगरानी समिति सॅं मूल्यांकन हो।
✤ समाज मे सवाल पूछबाक साहस जागृत हो।
आ, एहि सॅं मिलैत- जुलैत सार्थक एवं समाजोपयोगी एजेण्डा।
यदि ई दिशा पकड़ल जाए, त’ मिथिला फेर सँ एकटा आदर्श बनि सकैत अछि — जतए संस्था समाजक आईना बनत, आ नेतृत्व लोकक हाथ में रहत। अन्त मे,
संगठन यदि सजीव हो, तऽ समाजो जीबत।
यदि ओ भटकत तऽ जनचेतना मरत।।
मिथिला के भाषा, संस्कृति आ जन चेतना के भविष्य एहि विकल्प पर निर्भर अछि ।