मिथिला के इतिहास संस्कृति, परम्परा, रीति रिवाज आ जीवन शैली के लेल जानल जाइत अछि  ।

एहि क्षेत्रक नवविवाहिता विवाह के बाद आबएबाला पहिल साउन के कृष्णपक्षक पञ्चमी तिथि ( मौना पञ्चमी )  सॅं शुरू कऽ शुक्ल पक्षक तृतीया धरि करीब तेरह सॅं पन्द्रह दिन तक मधुश्रावणी पूजा करैत छथि। मधुश्रावणी मिथिला के सांस्कृतिक धरोहर आ प्रमुख लोकपर्व थीक जकरा बेटी के नैहर मे उत्सव के रूप मे मनाओल जाइत छैक  ।

मधुश्रावणी व्रतोत्सव के प्राचीन इतिहास छै, मान्यता छै जे ई व्रत सर्व प्रथम माता पार्वती द्वारा भगवान शिव केॅ जन्म जन्मान्तर धरि पति के रूप मे वरण करबाक उद्देश्य सॅं कएल गेल छल  । व्यवहारिक पटल पर देखला सॅं ई बूझाइत अछि जे नवविवाहिता के वैवाहिक जीवन सहज बनएबाक उद्देश्य सॅं एकर शुरुआत कएल गेल होएत  । एहि पाक्षिक उत्सव मे नवविवाहिता अनून के सेवन करैत छथि आ सासुर सॅं आएल अन्न, फल आदि मात्र ग्रहण करैत छथि  ।

ललना लोकनि सोलहो श्रृंगार कऽ सुन्दर- सुगंधित पुष्प-पत्र टीपैत हंसी- ठीठोला करैत छथि। ग्रामीण क्षेत्र मे एकर सुन्दरता आओर भब्य रूप मे देखल जा सकैत अछि जतए नवविवाहित ग्राम्य- कन्या समूह मे फूल लोढ़ैत छथि  । नव जीवन के नव उमंग प्रस्फुटित होइत देखि ग्राम्य जीवन धन्य-धन्य भऽ जाइत अछि। गामक सब फूलबारी आ घर- आंगन मे लागल फूल पर हिनका सभक एकाधिकार रहैत अछि।

कुनु रोकटोक नहि, स्वच्छन्दता पूर्वक अपन उल्लास प्रकट करबाक स्वतंत्रता रहैत छै। प्रत्येक घर – आंगन वेटीक एहि समूह के स्वागत करबाक हेतु आतुर रहैत अछि। सखी सभक वीच वैवाहिक अनुभव के आदानप्रदान आ नवविवाहित जीवन के सुन्दर सपना केॅ बूनैत सभटा फूल पात एक जगह जमा कएल जाइत अछि, ओकर बाद सभ केओ अपन-अपन बांसक चंगेरा ओहि फूल पात सॅं सजा केॅ निज- निज गृह जाइत छथि  ।

प्रातःकाल सजल चंगेराक एहि फूल सॅं भगवान शिव, माता पार्वती आ नाग देवता के पूजा करैत व्रतालु लोकनि मधुर श्रावणी के कथा श्रवण करैत छथि। मिथिलांचल के कर्मकाण्ड मे  पुरोहित के भूमिका सर्वत्र पुरुष द्वारा सम्पादित होइत अछि किन्तु, एहि पूजा मे पुरोहित महिला होइत छथिन्ह।

बन्धु बान्धव आ टोल पड़ोस के महिला सभ केॅ हकार देल जाइत छै आ’ सोहागिन स्त्री लोकनि एहि पूजा मे सहभागी भऽ उत्सव करैत छथि। पूजा अवधि धरि महिला लोकनि गोसाउनी, गौरी, बिषहरा आ शिव स्तुति के गीत गबैत वातावरण केॅ भक्तिमय बनएबाक संगहि कोहबर, जीवन मूल्य आ समाज के झलक दैत पारम्परिक पाबनि गीत सॅं उत्सव केॅ आनन्दमय बनबैत छथि।

बस्तुत: ई गीत सभ वैवाहिक जीवन मे महिला के नव भूमिका, समाज आ सम्बन्ध के मधुरता आ जटिलता केॅ दर्शाबैत अछि। ई गीत सभ नव विवाहिता के दाम्पत्य जीवन केॅ मधुमय आ सुखमय बनएबाक हेतु अत्यंत शिक्षाप्रद होइत अछि  ।

एहि अवसर पर तेरह दिन धरि पुरोहितनी मधुश्रावणी कथा सुनबैत छथिन्ह। जाहि कथा के विषय- वस्तु निम्नानुसार होइत अछि:

पहिल दिन मौना पञ्चमी आ महादेव के पारिवारिक, दोसर दिन बिहुला, मनसा, बिषहरा एवं गौरीक, तेसर दिन पृथ्वी के उत्पति आ समुद्र मन्थन, चारिम दिन माता सती, पांचम दिन महादेव के पारिवारिक, छठ़म दिन गौरी के जन्म आ गंगा, सांतम दिन माता गौरी के तपस्या आ काम दहन, आंठ़म दिन गौरी विवाह, नवम दिन मैना के मोह आ गौरी विवाह, दशम दिन भगवान कार्तिकेय आ गणेश जन्म, एगारहम दिन सन्ध्या विवाह, बारहम दिन बाल वसंत आ गोसाउन, तेरहम दिन श्रीकर राजा के कथा  ।

उपरोक्त कथा सभ भक्ति श्रृंगार आ व्यवहार के अदभुद सम्मिश्रण के रूप मे प्रस्तुत कएल जाइत अछि। एहि तरहें दाम्पत्य जीवन के आनन्द रस सॅं भीजल भक्ति आ श्रद्धा सॅं ओतप्रोत व्रत श्रृखंला के अन्तिम दिन मधुश्रावणी अबैत छै, जहिआ टेमी दगबाक प्राचीन परम्परा अछि। यद्यपि आधुनिकता के एहि दौर मे किछु महिला प्रश्न उठा रहल छथिन्ह जे जाहि परम्परा सॅं केकरो कष्ट पहुंचए ताहि मे सुधार होएबाक चाही परन्तु एखनहुं अधिकांश  के मान्यता छै जे टेमी दागए के प्रथा पति के दीर्घायु सॅं सम्बंधित छै तदर्थ ई बरकरार रहक चाही।

वस्तुतः एहि प्रथा मे बिधकरी नव विवाहिता के ठेहुंन आ पैर पर जरैत टेमी सॅं दागैत छथि आ ओहि कन्या के पति एहि समय मे पानक पात सॅं नव वधू के आंखि झापनय रहैत छथिन्ह। परम्परा अदभुद अछि मुदा एकर धार्मिक मान्यता छै जे मधुश्रावणी पूजा के मुख्य देवता भगवान शिव, माता पार्वती आ नाग छथि। टेमी केॅ नाग के प्रतीक मानल जाइत अछि।

उपरोक्त विधि सॅं टेमी रूपी नाग के दंश केॅ स्वीकार कऽ नव विवाहिता अपन पति के दीर्घायुक कामना नाग देव सॅं करैत छथि। मानल जाइत अछि जाहि वधू के पैर पर एहि टेमी के चिन्ह बनि जाइत छैक हुनकर पति के सर्पदंश सॅं अकाल मृत्यु नहि होइत छै। अस्तु, एहि परम्परा के औचित्य अनौचित्य पर वहस जारी अछि, निष्कर्ष सुखद आ सार्थक होएत से विश्वास राखी।

अन्ततः मधुश्रावणी दिन नव विवाहित व्रती के सासुर पक्ष द्वारा सोहागिन स्त्रीगण लोकनि केॅ निमंत्रण दऽ सामूहिक भोज के आयोजन कऽ व्रत के समापन होइत अछि।

वस्तुतः मधुश्रावणी मिथिला के एकटा एहेन जीवंत परम्परा थीक जे स्त्री जीवन के सामाजिक, धार्मिक आ सांस्कृतिक पक्ष केॅ समेटने छै। ई पर्व केवल पूजा के माध्यम नहि अपितु नारी सशक्तिकरण, पर्यावरण चेतना आ सास्कृतिक संवाद के अदभुद उदाहरण थीक। वैवाहिक जीवन मे प्रण, परम्परा, नारी के नव भूमिका सन गम्भीर विषय केॅ मनोरंजनात्मक ढंग सॅं प्रस्तुत कएल जाइत अछि। नाग देवता सहित सप्तमातृका के पूजा सॅं वैवाहिक सुख आ सुस्वास्थ्य के कामना कएल जाइत अछि।

पूजा सामग्री आ प्रारम्भिक रीति मे प्रकृति के सम्मान, सामूहिक सहभागिता आ सामुदायिक समरसता के भावना प्रस्फुटित होइत अछि  ।

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