कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि केॅ आंवला नवमी अथवा अक्षय नवमी के रूप मे मनाओल जाइत अछि। आंवला केॅ धात्री सेहो कहल जाइत छै।
धात्री के अर्थ होइत छै पालन करए वाली माता अर्थात माता के दूध के समान पालन पोषण करए वाला फल धात्री होइत अछि। एहि तथ्य केॅ आयुर्विज्ञान परा पूर्व काल सॅं प्रमाणित कएने अछि। एकरा मे प्रचूर मात्रा मे विटामिन सी, कैल्शियम, आयरन आ फास्फोरस पाएल जाइत छै। धात्री के फल, बीज आ पात के सेवन सॅं त्वचा सम्बन्धी विभिन्न रोग ठीक होइत अछि, केश केॅ कारी, घनगर आ चमकदार बनएबा मे ई सर्वोत्कृष्ट औषधि थीक।
एकरा अतिरिक्त विभिन्न मात्रा आ तरीका सॅं धात्री के सेवन सॅं मधुमेह नियन्त्रण, पथरी के नाश, हीमोग्लोबिन मे बृद्धि, दृष्टि दोष नियन्त्रण, स्मरण शक्ति मे बृद्धि, दांत के दर्द आ कैविटी सॅं मुक्ति, हीचकि आ उल्टी पर नियंत्रण, शरीरक तापमान मे सन्तुलन, कमजोर हड्डी मे मजबूती, उच्च रक्तचाप नियन्त्रण आ नस के ब्लॉकेज केॅ ठीक करल जाइत अछि। मानव जीवन केॅ ई बृक्ष रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़एबाक हेतु महौषधि रूप मे एकटा उत्कृष्ट वरदान थीक।

एहि मास मे मिथिला मे धात्री के नीचा मे पाक कऽ केॅ सपरिवार एहि बृक्ष तर भोजन करबाक विशेष महत्व होईत छै। भोजन पात्र मे धात्री के पात केॅ खसाओल जाइत छैक जे शारीरिक स्वास्थ्य के हेतु अत्यंत लाभप्रद होइत अछि। धार्मिक मान्यतानुसार एहि गाछ के नीचा भोजन कयला सँ मनुष्य के अन्न धन भण्डार सदैव भरल रहैत छै, कार्तिक मास मे धात्री के जड़ि मे प्रति दिन जलार्पण सॅं विभिन्न के दोष मुक्ति होइत छै आ भगवान विष्णु प्रसन्न भऽ आशीर्वाद प्रदान करैत छथिन्ह।
पौराणिक कथा अनुसार सृष्टि सॅं पूर्व जखन समस्त ब्रहमाण्ड जलमग्न छलै आ ब्रह्मा कमल फूल पर बैसि केॅ निराकार ब्रह्म के तपस्या मे तल्लीन छलाह तखन हुनकर आंखि सॅं नोर टपकय लागल आ सम्पूर्ण संसार मे यत्र तत्र खसए लागल, अही अश्रु कण सॅं धात्रीक उत्पत्ति भेल जे भगवान विष्णु के सर्वाधिक प्रिय बृक्ष सभमे एक थीक ।सृष्टि कर्ता के प्रेमाधिक्य सॅं उत्पन्न आंवला एहि जगत मे धात्रीक स्वरूप धारण कएलक ।
पौराणिक कथा अनुसार कोनो समय मे माता लक्ष्मी पृथ्वी पर घुमबाक उद्देश्य सॅं एलीह। एहि ठाम आबि केॅ ओ सोचय लगलीह जे भगवान विष्णु आ शिव के पूजा आराधना एकहि संग कोना कयल जा सकैत अछि। हुनका स्मरण भेलन्हि जे तुलसी आ बेल के संयुक्त गुण आंवला में पाओल जाइत अछि।

माता लक्ष्मी धात्री गाछ के नीचा पूजा करबाक लेल बैसि गेलीह। माँ लक्ष्मी के भक्ति भाव आ एहि बृक्षक प्रभाव सँ प्रसन्न भऽ भगवान विष्णु आ आशुतोष शंकर साक्षात प्रकट भऽ गेलाह। माता लक्ष्मी ओहि गाछ के नीचा बैसि कए भोजन बनाओलनि आ दुनू भगवान के भोजन कराओलनि।
भोजनोपरांत भगवान विष्णु आ शिव आशीर्वाद देलथिन्ह जे जे कियो एहि पवित्र कार्तिक मास मे धात्री गाछक नीचा भोजन करताह अथवा कराओताह हुनका सुख, सम्पदा आ स्वस्थ तथा दीर्घ जीवन के आशीर्वाद हरि हर संग लक्ष्मी सॅं प्राप्त हेतैन्ह। माता लक्ष्मी के द्वारा ई कार्य कार्तिक शुक्ल नवमी केॅ कयल गेल छल तेॅ एहि तिथि केॅ विशेष महत्व देल जाइत अछि।

मान्यता अछि जे कार्तिक शुक्ल नवमी सँ पूर्णिमा धरि भगवान श्री विष्णु लक्ष्मीक संग धात्री के पात मे निवास करैत छथि। एहि तिथि मे उपरोक्त बृक्ष के पूजा लक्ष्मी नारायण के पूजा समान अक्षय फल केॅ प्रदान करैत अछि। एक अन्य मान्यता अनुसार एहि विशेष मास मे धात्री गाछ मे ॐ धात्र्यै नम: के मन्त्रोच्चारणक संग दूध चढ़ेला सॅं पितर प्रसन्न होइत छथिन्ह आ सन्तति बृद्धि आ सुख के आशीर्वाद दैत छथिन्ह। वास्तुशास्त्र के अनुसार आंवला के बृक्ष घर मे लगाएब शुभ होइत अछि। एकरा लगएला सॅं नकारात्मक ऊर्जा के नाश आ सकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव मे बृद्धि होइत छैक।
एहि बृक्ष के प्रभाव सँ घर मे सुख, समृद्धि आ शान्ति बनल रहैत छै। निवास स्थान के पूर्व, उत्तर वा उत्तर पूर्व दिशा मे ई बृक्ष लगएबाक चाही।




