मिथिला केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहि, बल्कि हजारों वर्ष पुरान सभ्यता, संस्कृति, लोकपरम्परा आ जीवन-दर्शनक जीवित धरोहर थीक । एहि सांस्कृतिक परम्पराक आत्मा मैथिली भाषा आ लोकगीत थीक ।
लोकगीत मिथिलावासीक सुख-दुःख, प्रेम-विरह, संस्कार, श्रम, आस्था आ सामाजिक चेतनाक जीवित अभिव्यक्ति रहल अछि । आधुनिकता, वैश्वीकरण आ प्रवासनक प्रभावसँ जखन लोकसंस्कृति संकटमे पड़ि रहल अछि, एहन अवस्थामें मैथिली विकास अभियान विराटनगरद्वारा २०८३ जेठ ३० गते आयोजनके घोषणा कएलगेल “ “गीत–नादः मैथिली लोकगीत प्रतियोगिता” अत्यन्त सान्दर्भिक, समयोचित आ सांस्कृतिक दृष्टिसँ महत्वपूर्ण प्रयास अछि। ई प्रतियोगिता केवल मनोरंजनक कार्यक्रम नहि, बल्कि मैथिली भाषा, लोकसंगीत आ सांस्कृतिक पहिचान केँ नव पीढ़ी सँ जोड़बाक एक सशक्त अभियान थीक ।
लोकगीत लोकजीवनक सहज अभिव्यक्ति होइत अछि । मिथिलामे जन्मसँ मृत्युपर्यन्त प्रत्येक संस्कारमे गीतक विशेष स्थान रहल अछि। सोहर, समदाउन, विवाहगीत, कजरी, झूमर, फगुआ, मलार, भगैत, डहकन, बटगमनी आदि गीत मिथिला समाजक सांस्कृतिक संरचनाकेँ जीवित रखने अछि । ई गीतसभ केवल संगीत नहि, बल्कि समाजक इतिहास, लोकज्ञान, परम्परा आ सामूहिक स्मृति के संवाहक थीक । एहि लोकगीतसभमे मिथिलाक बोली, मुहावरा, रीति-रिवाज, लोकमान्यता आ भावविश्व सुरक्षित रहल अछि ।
कुनो भाषा ताधरि जीवित रहैत अछि, जाधरि ओ जनजीवनमे व्यवहारिक रूपसँ प्रयोग होइत रहैत अछि । लोकगीत मैथिली भाषाकेँ पीढ़ीदर-पीढ़ी हस्तान्तरित करबाक सबसँ प्रभावकारी माध्यम रहल अछि । ग्रामीण परिवेशमे अशिक्षित लोकसभ सेहो गीतक माध्यमसँ शुद्ध मैथिली बाजैत आ सीखैत आबि रहल छथि । लोकगीतसभ मैथिली भाषाक मिठास, लय, उच्चारण आ शब्दसम्पदाकेँ जीवित रखने अछि । आधुनिक समयमे जखन युवापीढ़ी विदेशी भाषा आ पाश्चात्य संस्कृतिक प्रभावमे अपन मातृभाषासँ दूर भ’ रहल अछि, तखन लोकगीत प्रतियोगिता नवपीढ़ीमे मैथिली प्रति आकर्षण उत्पन्न क’ सकैत अछि। मंच पर गीत प्रस्तुति युवामे भाषा गौरवक भावना जगबैत अछि।
“गीत-नाद” प्रतियोगिता अनेक दृष्टिसँ सांस्कृतिक संवर्द्धनमे उपयोगी अछि, जेना :
१. लुप्त होइत लोकधुनक संरक्षण
बहुत रास पारम्परिक गीत आइ विलुप्तिक कगार पर अछि । प्रतियोगिताक माध्यमसँ ओहि गीतसभ केँ पुनः खोजल, गाओल आ अभिलेखित कएल जा सकैत अछि।
२. नव प्रतिभाक उद्भव
एहन मंच नव गायक, संगीतकार आ लोककलाकार केँ अवसर प्रदान करैत अछि। युवा कलाकार अपन प्रतिभा सँ मैथिली लोकसंगीत मे नव ऊर्जा भरि सकैत छथि ।
३. सांस्कृतिक एकताक संवर्द्धन
मिथिला भारत आ नेपाल दुनू देशमे फैलल सांस्कृतिक क्षेत्र थीक । विराटनगरमे आयोजित ई कार्यक्रम सीमापार सांस्कृतिक एकता, आत्मीयता आ भाषिक सम्बन्ध केँ मजबूत बनबैत अछि।
४. सामाजिक शिक्षाक माध्यम
लोकगीतमे नैतिकता, पारिवारिक मूल्य, स्त्री-सम्मान, प्रकृति-प्रेम आ सामाजिक सद्भाव के संदेश रहैत अछि । एहि माध्यमसँ समाजमे सकारात्मक चेतना प्रसारित होइत अछि।
५. डिजिटल युगमे सांस्कृतिक दस्तावेजीकरण
प्रतियोगिताक गीतसभ केँ रिकॉर्ड क’ डिजिटल प्लेटफॉर्मपर राखल जा सकैत अछि जाहि सॅं भविष्य लेल अमूल्य सांस्कृतिक संग्रह तैयार होएत ।
आजुक समयमे पाश्चात्य संगीत, त्वरित मनोरंजन आ डिजिटल संस्कृति के कारण पारम्परिक लोकगीतक लोकप्रियता घटि रहल अछि। विवाह समारोह मे डीजे संस्कृति लोकगीत केँ विस्थापित क’ रहल अछि। अनेक युवा अपन लोकधुनिसँ अपरिचित छथि।
एहन परिस्थितिमे “गीत-नाद” जेकाँ आयोजन सांस्कृतिक पुनर्जागरण के कार्य क’ सकैत अछि । ई लोकसभ केँ स्मरण करबैत अछि जे आधुनिकता अपन मूल सँ कटबाक नाम नहि, बल्कि अपन परम्परा केँ नव रूपमे संरक्षित करबाक प्रक्रिया होयबाक चाही।
लोकगीत केवल मनोरंजनक विषय नहि, बल्कि लोकसाहित्य, समाजशास्त्र, इतिहास, संगीतशास्त्र आ मानवशास्त्रक अध्ययन के महत्वपूर्ण स्रोत थीक । प्रतियोगिताक माध्यमसँ शोधकर्ता लोकधुनि, लोकभाषा, सामाजिक संरचना आ मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहासपर अनुसन्धान क’ सकैत छथि। विद्यालय आ विश्वविद्यालय स्तरपर सेहो एहन प्रतियोगिता सांस्कृतिक शिक्षाकेँ प्रोत्साहित क’ सकैत अछि।
“गीत-नाद : मैथिली लोकगीत प्रतियोगिता” मिथिला संस्कृति के संरक्षणक दिशा मे अत्यन्त प्रशंसनीय आ दूरदर्शी पहल थीक । ई केवल गीतक आयोजन नहि, बल्कि भाषा, संस्कृति, लोकस्मृति आ सामूहिक पहिचान केँ बचेबाक सांस्कृतिक आन्दोलन थीक ।
लोकगीत मिथिलाक आत्मा थीक । जँ ई जीवित रहत, तखनहि मैथिली भाषा आ मिथिला संस्कृति सेहो जीवन्त रहत । अतः समाज, संस्था, युवा वर्ग आ सरकार सभकेँ मिलि केँ एहन आयोजनसभ केँ निरन्तर प्रोत्साहन देबाक आवश्यकता अछि।
अन्ततः ई कहब उचित होएत जे :
“जतए लोकगीत जीवित अछि, ततए लोकसंस्कृति जीवित अछि, आ जतए लोकसंस्कृति जीवित अछि, ततए समाजक आत्मा सुरक्षित अछि।” अतः आउ, हम सभ मिलि मैथिलीक मधुर स्वरकेँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित राखी।
